अपनों का मिला साया तो दूर हुई टीबी की छाया - पूरे कोर्स से मात्र छह महीने में ठीक हुए दिवाकर - सरकारी अस्पतालों में मुफ्त है जांच और इलाज

 अपनों का मिला साया तो दूर हुई टीबी की छाया


- पूरे कोर्स से मात्र छह महीने में ठीक हुए दिवाकर 

- सरकारी अस्पतालों में मुफ्त है जांच और इलाज


मुजफ्फरपुर, 24 फरवरी| 

जिस उम्र में युवा अपने सुनहरे भविष्य की ओर कदम बढाने लगते हैं उस उम्र में टीबी जैसी बीमारी का होना दिवाकर के अरमानों के पंख कतरने जैसा था। बसौली पंचायत के मोरनीश गांव के दिवाकर को टीबी होने की बात का पता अक्टूबर 2015 में चला। जब तीन महीने की लंबी खांसी, बुखार और वजन घटने के कारण वह डॉक्टर के पास गया। छह महीने की नियमित दवा के सेवन और अपनों के भरपूर सहयोग की बदौलत दिवाकर ने छह महीने में ही टीबी को मात दे दी| वह  टीबी की  जागरूकता को ही सर्वोपरि मान लोगों को जागरूक भी कर रहे हैं। 

लक्षणों को मामूली समझ मैंने गांव के चिकित्सक से ही दवा खा ली-

    दिवाकर कहते हैं मुझे या मेरे घर में टीबी के बारे में किसी को पता भी नहीं था। जुलाई 2015 में मैं एक सामूहिक कार्यक्रम में गया था उसी रात से मुझे खांसी की शुरुआत हुई। फिर धीरे-धीरे बुखार भी रहने लगा। इन लक्षणों को मामूली समझ मैंने गांव के चिकित्सक से ही दवा खा ली। फिर भी मुझमें कोई सुधार नहीं था। तभी मुजफ्फरपुर में एक डॉक्टर से दिखाने और बलगम जांच कराने के बाद पता चला कि मुझे टीबी है। 

फिजूल बातों को दूर, दवाओं को रखा पास

दिवाकर कहते हैं जब यह बात मेरे गांव मोरनीश में पता चला  तो जिन बच्चों को मैं ट्यूशन पढ़ाता था उनके अभिभावकों ने बच्चों को आने से मना कर दिया। जान -पहचान के बुजुर्ग कहते थे कि अब मैं नहीं बचूंगा। पर मैंने लोगों की बातों को दूर और दवाइयों को पास रखा। जिसका नतीजा रहा कि चार महीने बाद ही बलगम जांच निगेटिव हो गया, पर मैंने अपने दवाइयों का सेवन कोर्स के अनुसार करता रहा। छह महीने दवा खाने के बाद मैं पूरी तरह ठीक हो गया। 

समाज की मिटी धारणा -

दिवाकर कहते हैं कि जब मैं पूरी तरह से ठीक हो गया तो गांव के बूढ़े -बुजुर्गों की गलत धारणा टीबी के प्रति मिट गयी। वह समझ गए कि अब टीबी का संपूर्ण इलाज  संभव है। मेरे इलाज के तरीके और दवाओं के बारे में वह अक्सर ही प्रश्न पूछते थे। मैंने उन्हें बताया कि टीबी का इलाज अब सरकारी अस्पतालों पर पूर्णत: उपलब्ध है और वह भी मुफ्त में। इसके बाद मैंने खुद भी ठाना कि अब मैं टीबी के मरीजों को जागरूक  करुगां। 2019 में मैं टीबी मुक्त वाहिनी से जुड़ा और अभी तक करीब 100 टीबी मरीज की खोज कर उन्हें इलाज के लिए प्रेरित कर चुका हूं।

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