सात नदियों के पार टीबी पर जागरूकता की मशाल जला रहे धीरज

- थारू और उरांव जनजातियों को करते हैं जागरूक

- शिक्षण से समय मिलते ही टीबी पर लोगों को करते हैं जागरूक

बेतिया। 12 सौ की आबादी वाला भूरहवा दोन गांव सात नदियों के पार है। थारु और उरांव जनजाति विशेष इस गांव में बिजली और सड़क मार्ग की कमी है। फिर भी ताज्जुब की बात है कि लोग यहां टीबी और उसके उपचार से अवगत हैं। इस जनसंचार को फैलाने में टीबी चैंपियन और भूरहवा दोन निवासी धीरज कुमार और टीबी विभाग ने काफी अहम भूमिका निभाई है। धीरज खुद भी थारू जनजाति से ताल्लुक रखते हैं और गांव से रामनगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लाकर कई लोगों को टीबी मुक्त कराया है। धीरज खुद भी दो बार टीबी से ग्रसित हो चुके हैं, पर अपनी धैर्य और बिना छूटे दवाइयों के सेवन ने धीरज को मात्र आठ महीनों में टीबी मुक्त कर दिया। धीरज कहते हैं कि टीबी किसी की जिंदगी रोक नहीं सकती, बशर्ते हम टीबी को पहले ही रोक दें।

दो वर्ष पहले हुए थे टीबी से ग्रसित:

धीरज कहते हैं कि करीब दो साल पहले मुझे भूख कम लगना, वजन में लगातार कमी और खांसी के साथ बुखार आ रहा था। गांव की ही सेविका ने केएचपीटी के प्रतिनिधि जीतेन्द्र जी से मिलवाया था। रामनगर आकर उन्होंने मेरा बलगम टेस्ट और एक्सरे किया। कुछ दिनों बाद टीबी की पुष्टि हुई। कोविड होने के बावजूद मुझे हमेशा दवाई मिलती रही । लगातार आठ महीने मैंने दवा खाई और ठीक हो गया।

दोन क्षेत्र में फैलाते हैं जागरूकता: 

धीरज कहते हैं कि दोन क्षेत्र में जनजातियां ही अधिकतर निवास करती हैं। मैं भी उनमें से ही एक था। मैंने टीबी के दौरान जो कष्ट झेले वह और कोई न झेल पाए इसके लिए मैंने दोन क्षेत्र में ही टीबी पर जागरूकता फैलाना शुरु कर दिया। उन्हीं के बीच का था तो लोगों को समझाने में इतनी दिक्कत नहीं हुई। कई लोग मेरे पास खुद भी आए जिन्हें मैंने रामनगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाकर इलाज कराया। वे भी अब स्वस्थ हो चुके हैं। मैं अब शिक्षक के रूप में कार्य करता हूं, पर समय मिलते ही फिर से उन सात नदियों के पार अपने देश में टीबी पर लोगों को जागरूक करने चला जाता हूं। मेरा व्यावसायिक और टीबी पर शिक्षा का सिलसिला जब तक जीवित हूं, चलता रहेगा।

सीडीओ ने जतायी सहमति:

सीडीओ डॉ टीएन प्रसाद बताया कि दोन क्षेत्र में धीरज जैसे टीबी चैंपियन और केएचपीटी की सहायता से टीबी पर जागरुकता और सक्रिय मरीजों की खोज की जाती है। समाज के लोग ही समाज को टीबी मरीजों को मुख्यधारा की चिकित्सा व्यवस्था से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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