जब अपनी तकलीफ बनी दूसरों के लिए ताकत
-आठ साल फाइलेरिया से जूझे सीताराम, अब गांव के मरीजों को दे रहे हौसला
मुजफ्फरपुर। किसी बीमारी से लड़ने की सबसे बड़ी ताकत हमेशा दवा नहीं होती, कई बार सही जानकारी और किसी अपने का भरोसा भी इंसान को फिर खड़ा कर देता है। और जब कोई खुद उस लड़ाई से गुजर चुका हो, तो उसकी आवाज दूसरे मरीजों के लिए और मजबूत उम्मीद बन जाती है। सकरा प्रखंड के मझौलिया गांव के 63 वर्षीय सीताराम महतो की कहानी इसी बदलाव की कहानी है। करीब आठ साल तक फाइलेरिया की तकलीफ झेलने, इलाज में काफी पैसा खर्च करने और एक समय उम्मीद छोड़ देने वाले सीताराम आज खुद को संभालने के साथ गांव के दूसरे मरीजों का सहारा बन रहे हैं। उन्होंने तीन फाइलेरिया मरीजों को रोगी हितधारक समूह से जोड़ा, दो मरीजों का दिव्यांगता प्रमाणपत्र बनवाने में मदद की और अब आशा कार्यकर्ता के साथ लोगों को नियमित दवा सेवन के लिए जागरूक करने में सहयोग करेंगे।
मझौलिया गांव की गलियों में अब सीताराम की पहचान सिर्फ एक मरीज की नहीं रह गई है। किसी मरीज के घर जाना हो या किसी ग्रामीण को फाइलेरिया से बचाव के बारे में समझाना, वह अपनी बीमारी के अनुभव को साथ लेकर आगे बढ़ते हैं। लेकिन कुछ समय पहले तक उनकी अपनी जिंदगी उम्मीद से खाली हो चुकी थी।
मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करने वाले सीताराम करीब आठ वर्षों से फाइलेरिया से पीड़ित हैं। बीमारी के इलाज में काफी पैसा खर्च हुआ। लगातार इलाज के बावजूद अपेक्षित राहत नहीं मिली। बीमारी के साथ काम करना और परिवार की जिम्मेदारियां निभाना मुश्किल होता गया। अंततः उन्होंने इलाज छोड़ दिया और बीमारी को अपनी जिंदगी का हिस्सा मान लिया।
सीएचओ के नेतृत्व वाले रोगी हितधारक समूह से मिला नया रास्ता:
बदलाव तब शुरू हुआ, जब सीताराम आयुष्मान आरोग्य मंदिर मझौलिया में कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर के नेतृत्व में संचालित रोगी हितधारक समूह से जुड़े।
समूह में उन्हें फाइलेरिया के साथ बेहतर तरीके से जीवन जीने और बीमारी के प्रबंधन की जानकारी मिली। साफ-सफाई, नियमित व्यायाम, प्रभावित अंग की देखभाल और दवा सेवन के महत्व को उन्होंने समझा।
सीताराम ने पहले किसी दूसरे को सलाह नहीं दी। उन्होंने जो सीखा, उसे सबसे पहले अपनी जिंदगी में उतारा। साफ-सफाई पर ध्यान देना शुरू किया और नियमित व्यायाम करने लगे। कुछ समय बाद उन्हें फायदा महसूस हुआ। वर्षों बाद उनके भीतर यह भरोसा लौटा कि बीमारी के बावजूद अपने जीवन को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है।
इसी अनुभव ने उनके भीतर एक नया सवाल पैदा किया- अगर सही जानकारी मिलने के बाद मुझे फायदा हो सकता है, तो गांव के दूसरे मरीजों को यह जानकारी क्यों न मिले,यहीं से सीताराम की भूमिका बदल गई।
मरीज से बने मरीजों के साथी:
उन्होंने गांव के तीन फाइलेरिया मरीजों को रोगी हितधारक समूह से जोड़ा। दो मरीजों का दिव्यांगता प्रमाणपत्र बनवाने में भी मदद की। अब वह गांव के लोगों को फाइलेरिया से बचाव, साफ-सफाई, व्यायाम और नियमित दवा सेवन के प्रति जागरूक करते हैं।
दवा सेवन अभियान में वह आशा के साथ मिलकर लोगों को फाइलेरिया रोधी दवा लेने के लिए प्रेरित करेंगे और दवा खिलाने में सहयोग करेंगे।
सीताराम कहते हैं, “मैंने इस बीमारी में बहुत कष्ट झेला है। इलाज में काफी पैसा खर्च हुआ, लेकिन फायदा नहीं हुआ तो मैंने इलाज छोड़ दिया था। बाद में रोगी हितधारक समूह से जुड़कर बीमारी के बारे में जानकारी मिली। खुद साफ-सफाई और व्यायाम शुरू किया तो फायदा महसूस हुआ। तब लगा कि दूसरे मरीजों को भी इसकी जानकारी मिलनी चाहिए।”
सीताराम की कहानी में आयुष्मान आरोग्य मंदिर की स्वास्थ्य सेवाएं, कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर का नेतृत्व, रोगी हितधारक समूह की भूमिका और आशा कार्यकर्ता की सामुदायिक भागीदारी एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती है। इस पूरी प्रक्रिया में सीताराम खुद भी एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गए हैं।
कभी फाइलेरिया के इलाज से निराश होकर पीछे हट चुके सीताराम आज दूसरे मरीजों को पीछे नहीं हटने की सलाह देते हैं। उनकी अपनी आठ साल की पीड़ा अब किसी दूसरे मरीज के लिए चेतावनी भी है और उम्मीद भी।
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